गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

अनूदित साहित्य


पंजाबी कविता

गुरप्रीत की सात कविताएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

(1) घर

गुम हुई चीज को
तलाशने के लिए
खंगाल डालती थी
घर का हर अंधेरा-तंग कोना
मेरी माँ !
बीवी भी अब ऐसा ही करती है
और अपनी ससुराल में बहन भी !

चीज़ों के गुम होने
और इनके रोने के लिए
अगर घर में अंधेरी-तंग जगहें न होंती
तो घर का नाम भी
घर नहीं होता।

(2) दोस्ती

जब छोटे-छोटे कोमल पत्ते फूटते हैं
और खिलते हैं रंग-बिरंगे फूल
मैं याद करता हूँ जड़ें अपनी
अतल गहरी ।

जब पीले पत्ते झड़ते हैं
और फूल बीज बन
मिट्टी में दब जाते हैं
मैं याद करता हूँ जड़ें अपनी
अतल गहरी ।

(3) जीने की कला

ये अर्थ
जो जीवंत हो उठे
मेरे सामने
अगर ये शब्दों की देह से होकर
न आते
तो कैसे आते
मैं हँसता हूँ, प्यार करता हूँ
रोता हूँ, लड़ता हूँ
चुप हो जाता हूँ
पार नहीं हूँ सब कुछ से
मुझे जीना आता है
जीने की कला नहीं।

(4) माँ

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए नहीं
कि जन्म दिया है
उसने मुझे

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए नहीं
कि पाला-पोसा है
उसने मुझे

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए
कि उसको
अपने दिल की बात कहने के लिए
शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती मुझे।

(5) पिता होने की कोशिश

दु:ख
गठरी मेंढ़कों की
गाँठ खोलता हूँ
तो उछ्लते-कूदते बिखर जाते हैं
घर के चारों तरफ

हर रोज़
एक नई गाँठ लगाता हूँ
इस गठरी में

कला यही है मेरी
दिखने नहीं दूँ
सिर पर उठाई गठरी यह
बच्चों को।
(6) चिट्ठियों से भरा झोला

कविता आई सुबह-सुबह
जागा नहीं था मैं अभी
सिरहाने रख गई- ‘उत्साह’।

उठा जब
दौड़कर मिला मुझे ‘उत्साह’
कविता की चिट्ठियों से भरा झोला थमाने।

एक चिट्ठी
मैंने अपनी बच्ची को दी
‘पढ़ती जाना स्कूल तक
मन लगा रहेगा…’

एक चिट्ठी बेटे को दी
कि दे देना अपने अध्यापक को
वह तुझे बच्चा बन कर मिलेगा…

चिट्ठी एक कविता की
मैंने पकड़ाई पत्नी को
गूँध दी उसने आटे में।

पिता इसी चिट्ठी से
आज किसी घर की
छत डाल कर आया है!

नहीं दी चिट्ठी मैंने माँ को
वह तो खुद एक चिट्ठी है !

(7) राशन की सूची और कविता

5 लीटर रिफाइंड धारा
5 किलो चीनी
5 किलो साबुन कपड़े धोने वाला
1 किलो मूंगी मसरी
1 पैकेट सोयाबीन
पैकेट एक नमक, भुने चने
थैली आटा
इलायची-लौंग 25 ग्राम…

कविता की किताब में
कहाँ से आ गई
रसोई के राशन की सूची ?

मैं इसे कविता से
अलग कर देना चाहता हूँ
पर गहरे अंदर से उठती
एक आवाज़
रोक देती है मुझे
और कहती है –
अगर रसोई के राशन की सूची
जाना चाहती है कविता के साथ
फिर तू कौन होता है
इसे पृथक करने वाला
फैसला सुनाता ?

मैं मुस्कराता हूँ
राशन की सूची को
कविता की दोस्त ही रहने देता हूँ।

दोस्तो !
नाराज़ मत होना
यह मेरा नहीं मेरे अंदर का फैसला है
अंदर को भला कौन रोके !

सूची अगर तुम
मेरी रसोई की नहीं
तो अपनी की पढ़ लेना

कविता अगर तुम
मेरी नहीं
तो अपने अंदर की पढ़ लेना।
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गुरप्रीत
संप्रति : पंजाबी अध्यापक ।
प्रकाशित कविता पुस्तकें : शबदां दी मरज़ी(1996), अकारन(2001)
पुरस्कार : कविता पुस्तक “शबदां दी मरज़ी” को गुरू नानक देव युनिवर्सिटी, अमृतसर की ओर से वर्ष 1996 का प्रो0 मोहन सिंह कविता पुरस्कार।

अन्य रुचियाँ : वाटर कलर में कुछ पेंटिग्स जो किताबों और पत्रिकाओं के टाइटिल पर लगीं। कुछ रेखांकन ‘संडे ऑबजर्वर’, ‘हंस’, ‘जनसत्ता’, ‘वागर्थ’ और ‘नया ज़माना’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।

संपर्क : वार्ड नं0 9
रामसिंह कुन्दन वाली गली
सिनेमा रोड, मानसा- 151505(पंजाब)
दूरभाष : 09872375898
ई-मेल : gurpreet-sukhan@yahoo.com

शनिवार, 30 अगस्त 2008

अनूदित साहित्य


पंजाबी कविता

पिछले दिनों पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका “प्रवचन” के नए अंक (जुलाई-सितम्बर 2008) में इमरोज़ जी की कविताएं पढ़ने को मिलीं। कविताएं पढ़कर हैरान था क्योंकि मैंने इमरोज़ जी को रंगों और ब्रश के कलाकार के रूप में ही अभी तक देखा-जाना था। उनकी पेंटिंग्स और स्कैच्स मुझे अपनी ओर खींचते रहे हैं। पर एक कवि के रूप उन्हें पहली बार देख-पढ़ रहा था। मैंने तुरन्त इमरोज़ जी से सम्पर्क किया। उन्होंने सहर्ष अपनी कविताओं के हिन्दी अनुवाद को “सेतु साहित्य” में प्रकाशन की अनुमति देते हुए कहा कि “अगर मेरी ये नज्में पाठकों को अच्छी लगती हैं तो अब ये उन्हीं की ही हैं।” अपने बारे में बेहद संक्षिप्त जानकारी देते हुए कहा कि मैं रंगों और ब्रश का कलाकार रहा हूं, पर आजकल कविताएं भी लिखने लगा हूँ। उन्होंने बताया कि वे लाहौर आर्ट स्कूल में तीन वर्ष रहे, पर जो कुछ भी सीखा है, वह खुद काम करके सीखा है। उनका मानना है कि पेटिंग और कविता सिखाई नहीं जा सकती। बस, जिनके अन्दर इनका बीज होता है, वह स्वयं फूट पड़ता है और फलता-फूलता रहता है।

मेरे लिए यह दिलचस्प संयोग की बात रही कि इधर मैंने इमरोज़ जी की पंजाबी कविताएं पढ़ीं और उनसे बात करके उनके हिन्दी अनुवाद को “सेतु साहित्य” में प्रकाशित करने का मन बनाया, उधर उसी दिन ‘अमृता-इमरोज़’ पर शायदा जी की बेहद खूबसूरत तीन पोस्टें उनके ब्लाग “उनींदरा” में पढ़ने को मिलीं। इस पोस्ट में दिए इमरोज़ जी के पहले दो चित्र “उनींदरा” से ही साभार लिए गए हैं।


इमरोज़ की कविताएं
पंजाबी से अनुवाद : सुभाष नीरव

बीज

एक ज़माने से
तेरी ज़िन्दगी के दरख़्त
कविता को
तेरे साथ रहकर
देखा है
फूलते, फलते और फैलते…
और जब
तेरी ज़िन्दगी का दरख़्त
बीज बनना शुरू हो गया
मेरे अन्दर जैसे
कविता की पत्तियाँ
फूटने लग पड़ीं
और जिस दिन
तेरी ज़िन्दगी का दरख़्त बीज बन गया
उस रात इक कविता ने
मुझे बुलाकर अपने पास बिठाया
और अपना नाम बताया

अमृता-
जो दरख़्त से बीज बन गई

मैं काग़ज़ लेकर आया
वह कागज़ पर अक्षर-अक्षर हो गई

अब कविता अक्सर आने लग पड़ी है
तेरी शक्ल में तेरी ही तरह मुझे देखती
और कुछ समय मेरे संग हमकलाम होकर
मेरे अन्दर ही कहीं गुम हो जाती है…
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प्यास
आदमी ज़िन्दगी जीने को
शिद्दत से बड़ा प्यासा था
इस प्यास के संग चलता
ज़िन्दगी का पानी खोजता-तलाशता
वह एक चश्मे तक पहुँच गया
प्यास इतनी थी
कि वह न देख सका, न पहचान सका
कि यह ज़िन्दगी का चश्मा नहीं
वह तो प्यासे पानी का चश्मा था
प्यास बुझाने को जब वह
पानी के करीब गया
प्यासे पानी ने आदमी को पी लिया…
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सोहणी
तस्वीरों की दुकान के बाहर
सोहणी की तस्वीर देखी
मैं इस सोहणी को घर ले आया
इस सोहणी को देखते-देखते
मुझे कल की
वह सोहणी दिखाई देने लग पड़ी
जिसने पंजाब का एक दरिया
कच्चे घड़े से पार किया था
कई बार…
और आज मुझे
एक और सोहणी दिखाई दे रही है
जिसने आधी सदी से
अपनी कलम से
सारा पंजाब पार किया है-
लगातार…
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चार छोटी कविताएं

(1)
हाथ में पकड़ा फूल
चुपचाप कह सकता है
कि मैं अमन के लिए हूँ
पर हाथ में पकड़ी तलवार
बोलकर भी नहीं कह सकती
कि मैं अमन के लिए हूँ…
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(2)
आसमान पर भले ही
आसमान जितना लिखा हो
कि ज़िन्दगी दु:ख है
तो भी
धरती पर आदमी
अपने बराबर तो लिख ही सकता है
कि ज़िन्दगी सुख भी है…
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(3)
मैं रंगों के संग खेलता
रंग मेरे संग खेलते
रंगों के संग खेलता-खेलता
मैं इक रंग हो गया
कुछ बनने, कुछ न बनने से
बेफिक्र, बेपरवाह…
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(4)
बिखरने के लिए लोग ही लोग
पर एक होने के लिए
एक भी मुश्किल…
दरख़्त पंछियों को जन्म नहीं देते
पर पंछियों को घर देते हैं…
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