बुधवार, 17 दिसंबर 2008

अनूदित साहित्य


मलयालम कविता


के. सच्चिदानंदन की पाँच कविताएं
अनुवादक : डा. विनीता/सुभाष नीरव

मैं लिख रहा हूँ

गली में गिरी सुबह की ओस पर
मैं लिख रहा हूँ तेरा नाम
जैसे पहले भी किसी कवि ने
लिखा था नाम- स्वतंत्रता का
हरेक वस्तु पर।

तेरा नाम लिखने लगा तो
मिटाना कठिन हो जाएगा
धरती और आकाश पर
क्रांति के साथ
प्रेम के लिए भी जगह है
तेरे नाम की सेज पर
सो रहा हूँ मैं
तेरे नाम की चहचहाट के साथ
जागता हूँ मैं
जहाँ-जहाँ मैं स्पर्श करता हूँ
उभर आता है तेरा नाम
झरते पत्तों के घसमैले रंगों पर
प्राचीन गुफाओं की स्याह दीवारों पर
कसाई की दुकान के दरवाजे पर
गीले रंगों पर
ताजे लहू पर
जुत रहे खेतों पर
चांदनी के फड़फड़ाते पंखों पर
काफी और नमक पर
घोड़े की नाल पर
नृतकी की मुद्रा पर
तारों के कंधों पर
शहद औ’ ज़हर पर
नींद पर, रेत पर, जड़ों पर
कुल्हाड़ी पर, बन्दूक की गोली पर
फांसी के तख़्ते पर
मुर्दाघर के ठंडे फर्श पर
श्मसान-शिला की चिकनी पीठ पर।
हमें क्या पता

हम दो बच्चें हैं
जो मम्मी-डैडी का खेल खेल रहे हैं
जानते नहीं हम आलिंगन का अर्थ
हमें क्या पता चुम्बन का विद्युतमयी प्रवाह
बस, यूँ ही स्पर्श कर लेते हैं
कुछ पत्तियाँ...
कुछ फूल...
कुछ फल...

बड़ी ममता से निहार रही है प्रकृति हमें
ज़िन्दगी में ठसाठस भरी
वंश-तृष्णा की
धीमी लौ को
अमर होने की इस
अर्थहीन इच्छा में
सुनो-
रात आँगन में दौड़ती चली जा रही है।


पीला-हरा

जब पीला पत्ता झरता है
हरा पत्ता हँसता नहीं
वह सिर्फ़ थोड़ा-सा कांप उठता है
उस फौजी की तरह
जो देख रहा है
गोली खाकर गिरते अपने पड़ोसी को।
सर्दी की बर्फीली छुअन से
जब फूलने लगती हैं उसकी नसें
ध्यान आता है उसे
नियति का रंग है पीला
और वह हो जाता है सुन्न।

और पीला पत्ता सड़ता है वेग से
ताकि वह बन सके हरा पता
खिला सके फूल
अगली बसंत में
हरा पत्ता नहीं जानता कुछ भी
मरने के बाद आत्माओं के
सफ़र के बारे में।

हरे पत्ते का दुख पीला पीला है
पीले पत्ते का सपना हरा-हरा
इसलिए जब नौजवान हँसते हैं
सूरजमुखी खिलते हैं
और.... हाँ, इसीलिए बूढ़ों के
आँसू झिलमिलाते हैं
मणियों की तरह...।

पागल

पागलों की कोई जाति नहीं होती
न धर्म होता है
वे लिंग भेद से भी परे होते हैं
उनका चाल-चलन अपना ही होता है
उनकी शुद्धता को जानना
बड़ा कठिन है।

पागलों की भाषा सपनों की भाषा नहीं
वह तो किसी दूसरे ही यथार्थ की(होती है)
उनका प्रेम चाँदनी है
जो पूर्णिमा में उमड़ता-बहता है।

जब वे ऊपर की ओर देखते हैं
तो ऐसे देवते लगते हैं
जिन्हें कभी सुना-गुना ही न हो
जब हमें लगता है कि
यूँ ही कंधे झटक रहे हैं वे
तो उड़ रहे होते हैं उस वक्त वे
अदृश्य पंखों के साथ।

उनका विचार है कि
मक्खियों में आत्मा होती है
देवता टिड्डे बन कर हरी टांगों पर फुदकते हैं
कभी-कभी तो उन्हें वृक्षों से
रक्त टपकता दिखाई देता है
कभी-कभी गलियों में
शेर दहाड़ते दिखाई देते हैं।

कभी-कभी बिल्ली की आँखों में
स्वर्ग चमकता देखते हैं
इन कामों में तो वे हमारे जैसे ही हैं
फिर भी चींटियों के झुण्ड को गाते हुए
केवल वही सुन सकते हैं।

जब वे सहलाते हैं पवन को तो
धरती को धुरी पर घुमाते हुए
आंधी को पालतू बनाते हैं
जब वे पैरों को पटक कर चलते हैं तो
जापान के ज्वालामुखी को
फटने से बचा रहे होते हैं।

पागलों का काल भी दूसरा होता है
हमारी एक सदी
उनके लिए एक क्षण भर होती है
बीस चुटकियाँ ही काफी है उनके लिए
ईशा के पास पहुँचने के लिए
आठ चुटकियों में तो वे बुद्ध के पास पहुँच जाएंगे।

दिन भर में तो वे
आदिम विस्फोट में पहुँच जाएंगे
वे बेरोक चलते रहते हैं
क्योंकि धरती चलती रहती है

पागल
हमारे जैसे
पागल नहीं होते।

पंचभूतों ने जो मुझे सिखलाया

धरती ने मुझे सिखलाया है-
सब कुछ स्वीकारना
सब कुछ के बाद
सबसे परे हो जाना
हर ऋतु में बदलना
यह जानते हुए कि
स्थिरता मृत्यु है
चलते चले जाना है
अन्दर और बाहर।

अग्नि ने मुझे सिखलाया है-
तृष्णा में जलना
नाचते-नाचते हो जाना राख
दुख से होना तपस्वी
काली चट्टानों के दिल और
सागर के गर्भ में
प्रकाश जागते हुए
ध्यानमग्न होना।

जल ने मुझे सिखलाया है-
बिना चेतावनी
आँख और बादल में से
टप टप टपकना
आत्मा और देह में
गहराई तक रिसना
और इन दोनों को देना संवार
फूल और आँसू से
स्वयं होना मुक्त
नाव और ठांव से
और विलय हो जाना
स्मृतियों के किनारे
उस अतल नील में।

पवन ने मुझे सिखलाया है-
बांस के झुरमुट में निराकार गाना
पत्तियों के माध्यम से भविष्य बतलाना
बीजों को पर-पंख
हवा-सा दुलराना
आंधी-सा रुद्र होना।

पंचभूतों ने मुझे यह सिखलाया-
जोड़ना-जुड़ना
टूटना-बिखरना
रूप बदलते रहना
जब तक न मिले मुक्ति
मुझे सारे रूपों से।
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(मलयालम के प्रख्यात कवि के. सच्चिदानंदन की कविताओं का पंजाबी अनुवाद डा. वनीता ने किया है जिसे “पीले पत्ते का सपना” शीर्षक से पुस्तक रूप में साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा वर्ष 2003 में प्रकाशित किया गया था। डा. वनीता स्वयं पंजाबी की चर्चित कवयित्री और आलोचक हैं। उक्त पाँचों कविताएं इसी पंजाबी कविता संग्रह से ली गई हैं और पंजाबी से इनका हिन्दी अनुवाद सुभाष नीरव ने किया है )

मलियालम के प्रसिद्ध कवि के. सच्चिदानंदन का जन्म 1946 में हुआ। वह कई वर्षों तक ‘इंडियन लिटरेचर’ के संपादक रहने के बाद ‘साहित्य अकादमी’ के सचिव भी रहे। वह अन्य कई संस्थाओं से संबद्ध रहे। इन्हें केरल साहित्य अकादमी के चार तथा अन्य कई पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। इनकी बहुत सी कविताओं का अनुवाद भारत और विश्व की अनेक भाषाओं में हो चुका है। इन्होंने नाटक और आलोचना के क्षेत्र में भी विशेष कार्य किया है। इनके उन्नीस कविता संग्रह, सामाजिक और आलोचना से संबंधित सोलह पुस्तकें और कई अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं।

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

अनूदित साहित्य


पंजाबी कविता

गुरप्रीत की सात कविताएं
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव

(1) घर

गुम हुई चीज को
तलाशने के लिए
खंगाल डालती थी
घर का हर अंधेरा-तंग कोना
मेरी माँ !
बीवी भी अब ऐसा ही करती है
और अपनी ससुराल में बहन भी !

चीज़ों के गुम होने
और इनके रोने के लिए
अगर घर में अंधेरी-तंग जगहें न होंती
तो घर का नाम भी
घर नहीं होता।

(2) दोस्ती

जब छोटे-छोटे कोमल पत्ते फूटते हैं
और खिलते हैं रंग-बिरंगे फूल
मैं याद करता हूँ जड़ें अपनी
अतल गहरी ।

जब पीले पत्ते झड़ते हैं
और फूल बीज बन
मिट्टी में दब जाते हैं
मैं याद करता हूँ जड़ें अपनी
अतल गहरी ।

(3) जीने की कला

ये अर्थ
जो जीवंत हो उठे
मेरे सामने
अगर ये शब्दों की देह से होकर
न आते
तो कैसे आते
मैं हँसता हूँ, प्यार करता हूँ
रोता हूँ, लड़ता हूँ
चुप हो जाता हूँ
पार नहीं हूँ सब कुछ से
मुझे जीना आता है
जीने की कला नहीं।

(4) माँ

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए नहीं
कि जन्म दिया है
उसने मुझे

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए नहीं
कि पाला-पोसा है
उसने मुझे

मैं माँ को प्यार करता हूँ
इसलिए
कि उसको
अपने दिल की बात कहने के लिए
शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती मुझे।

(5) पिता होने की कोशिश

दु:ख
गठरी मेंढ़कों की
गाँठ खोलता हूँ
तो उछ्लते-कूदते बिखर जाते हैं
घर के चारों तरफ

हर रोज़
एक नई गाँठ लगाता हूँ
इस गठरी में

कला यही है मेरी
दिखने नहीं दूँ
सिर पर उठाई गठरी यह
बच्चों को।
(6) चिट्ठियों से भरा झोला

कविता आई सुबह-सुबह
जागा नहीं था मैं अभी
सिरहाने रख गई- ‘उत्साह’।

उठा जब
दौड़कर मिला मुझे ‘उत्साह’
कविता की चिट्ठियों से भरा झोला थमाने।

एक चिट्ठी
मैंने अपनी बच्ची को दी
‘पढ़ती जाना स्कूल तक
मन लगा रहेगा…’

एक चिट्ठी बेटे को दी
कि दे देना अपने अध्यापक को
वह तुझे बच्चा बन कर मिलेगा…

चिट्ठी एक कविता की
मैंने पकड़ाई पत्नी को
गूँध दी उसने आटे में।

पिता इसी चिट्ठी से
आज किसी घर की
छत डाल कर आया है!

नहीं दी चिट्ठी मैंने माँ को
वह तो खुद एक चिट्ठी है !

(7) राशन की सूची और कविता

5 लीटर रिफाइंड धारा
5 किलो चीनी
5 किलो साबुन कपड़े धोने वाला
1 किलो मूंगी मसरी
1 पैकेट सोयाबीन
पैकेट एक नमक, भुने चने
थैली आटा
इलायची-लौंग 25 ग्राम…

कविता की किताब में
कहाँ से आ गई
रसोई के राशन की सूची ?

मैं इसे कविता से
अलग कर देना चाहता हूँ
पर गहरे अंदर से उठती
एक आवाज़
रोक देती है मुझे
और कहती है –
अगर रसोई के राशन की सूची
जाना चाहती है कविता के साथ
फिर तू कौन होता है
इसे पृथक करने वाला
फैसला सुनाता ?

मैं मुस्कराता हूँ
राशन की सूची को
कविता की दोस्त ही रहने देता हूँ।

दोस्तो !
नाराज़ मत होना
यह मेरा नहीं मेरे अंदर का फैसला है
अंदर को भला कौन रोके !

सूची अगर तुम
मेरी रसोई की नहीं
तो अपनी की पढ़ लेना

कविता अगर तुम
मेरी नहीं
तो अपने अंदर की पढ़ लेना।
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गुरप्रीत
संप्रति : पंजाबी अध्यापक ।
प्रकाशित कविता पुस्तकें : शबदां दी मरज़ी(1996), अकारन(2001)
पुरस्कार : कविता पुस्तक “शबदां दी मरज़ी” को गुरू नानक देव युनिवर्सिटी, अमृतसर की ओर से वर्ष 1996 का प्रो0 मोहन सिंह कविता पुरस्कार।

अन्य रुचियाँ : वाटर कलर में कुछ पेंटिग्स जो किताबों और पत्रिकाओं के टाइटिल पर लगीं। कुछ रेखांकन ‘संडे ऑबजर्वर’, ‘हंस’, ‘जनसत्ता’, ‘वागर्थ’ और ‘नया ज़माना’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।

संपर्क : वार्ड नं0 9
रामसिंह कुन्दन वाली गली
सिनेमा रोड, मानसा- 151505(पंजाब)
दूरभाष : 09872375898
ई-मेल : gurpreet-sukhan@yahoo.com