बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

अनूदित साहित्य






पंजाबी कविता

मित्रो, ‘सेतु साहित्य’ के अक्तूबर 2011 अंक में हम पंजाबी के बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि-कथाकार-चित्रकार जगतारजीत की कुछ कविताओं का हिंदी अनुवाद आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है, आपको ये कविताएं पसन्द आएंगी। आपकी छोटी-सी प्रतिक्रिया भी हमारा मनोबल बढ़ाती है, इसलिए अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवश्य अवगत कराते रहें…
-सुभाष नीरव


जगतारजीत के तीन कविताएँ
(हिंदी रूपान्तर : सुभाष नीरव)


खिड़की

उसने आहिस्ता से
खिड़की खोली
सिर बाहर निकाला
आँखें घुमाईं
गली सुनसान थी
तेज़ बहती हवा के साथ
रेतकण थे
नीले आसमान के आगे
रूई के फ़ाहों जैसे बादल
उड़े जा रहे थे
पश्चिम दिशा की ओर

कमरे में दाख़िल हुए
रेतकणों से बेख़बर
वह खिड़की में बैठी
नज़रों से सी रही थी बादल
आँखों से टपकते आँसुओं से
भरती रही उनमें पानी

खिड़की के इस ओर के हिस्से को
घर कहते हैं
जो अपने नियम के अंदर चलता है
खिड़की के दूसरी ओर का हिस्सा
गली से जुड़ा हुआ है
जिसके पार
जंगल-बियाबान है

वह दोनों के बीच अटकी
खिड़की के पल्ले की भाँति
हिल रही है।

कपड़े

खुले आसमान के नीचे
घर की स्त्री
टब में से धोए हुए कपड़े उठा
तार पर फैला रही है

तार पर फैलाते समय
उसके मन के अंदर
जी उठता है वह रूप
जिसने मैला वस्त्र उतार
रख दिया था धोने के लिए

हाथों से धुला वस्त्र उठाती
उंगलियों से छूती
आँखों से देखती-देखती
तार के हवाले कर देती
पल भर में उसने सारा परिवार
एक-दूजे के पास-पास
एक जगह पर इकट्ठा कर दिया

परिवार के सदस्य
आजकल ऐसे ही
हफ़्ते में एक-आध बार
अपने-अपने कमरों में से निकल
एक-दूसरे से मिलते हैं
फिर तह होकर जा टिकते हैं
अपनी-अपनी जगहों पर
अगली मुलाकात तक।

धोबी

मैले-कुचैले वस्त्र
चले जा रहे हैं
नदी नहाने
बैठ धोबी के सिर पर

भांत-भांत के रंगों वाले
भिन्न-भिन्न नाप के
जाति कोई, धर्म कोई
बंधे एक ही गठरी
चले जा रहे
बैठ धोबी के सिर पर

पसीने में भीगा कोई
किसी बदन का साथ छोड़
देर बाद
नया-नकोर कोई
रहा हिचकिचाता मैल से
आए बास किसी से
लहू के बूँद की
सभी एक जगह
एक बार नदी चले
बैठ धोबी के सिर पर

बस्ती के बाहर-बाहर
धोबी का घर है

मैले-कुचैले वस्त्र
चले जा रहे हैं
नदी नहाने
बैठ धोबी के सिर पर।
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जगतारजीत सिंह
जन्म : 12 दिसंबर 1951
शिक्षा : एम.ए., पी. एचडी
प्रकाशित पुस्तकें : कला अते कलाकार(कला), 1992 व 2005(पंजाबी व हिंदी में)। जंगली सफ़र(कविता), 2002(पंजाबी में)। रबाब(कविता),2006(पंजाबी में)। रंग अते लकीरें(कला), 2006(पंजाबी में)। अंधेरे में फूल जैसी सफ़ेद मेज(कविताएँ),2010(हिंदी में)। अद्धी चुंज वाली चिड़ी(बाल कहानियाँ), 2010(पंजाबी में)। अमलतास(कविताएँ), 2011(पंजाबी में)। पेंटर शोभासिंह : एक अध्ययन(प्रैस में)।
अनुवाद : घुन खादा होधा(असमी से) 2002, साहित्य अकादमी के लिए। स्वामी विवेकानन्द : एक जीवनी(हिंदी से) 2005, नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए। जंग खादी तलवार अते दो छोटे नावल(असमी से) 2009( साहित्य अकादमी के लिए)।
सम्मान : भाषा विभाग, पंजाब(1992)। पंजाबी अकादमी, दिल्ली(2002)। हिंदी अकादमी, दिल्ली(2005)। भाषा विभाग, पंजाब(2007)।
सम्पर्क : 118-ए, प्रताप नगर, जेल रोड, नई दिल्ली-110064
मेल : jagtarjeet@rediffmail.com
टेलीफोन : 9899091186

शनिवार, 3 सितंबर 2011

अनूदित साहित्य


मित्रो, सेतु साहित्य ब्लॉग का प्रारंभ 14 अगस्त 2007 को हुआ था यानी इसने चार वर्ष की यात्रा पूरी कर ली है। इस यात्रा के दौरान सेतु साहित्य भारतीय एवं विदेशी भाषाओं(पंजाबी, बंगला, मराठी, मलयालम, ओड़िया, संथाली, रूसी, नेपाली, जापानी, ईरानी, अमेरिकन आदि) के उत्कृष्ट साहित्य (यथा- कविता, लघुकथा, कहानी, पत्र) के हिंदी अनुवाद अन्तर्जाल के विशाल हिन्दी पाठकों को उपलब्ध करवाता रहा है। आगे भी यह सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा। हम उन सभी अनुवादक मित्रो से अनुरोध करते हैं कि वे भी भारतीय अथवा विदेशी भाषाओं के साहित्य का हिन्दी अनुवाद सेतु साहित्य के लिए भेंजे। रचनाएं छोटी और सारगर्भित हों, बस इतना खयाल रखें। इस बार हम पंजाबी कवयित्री डा गुरमिंदर सिद्धू की कविता का हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं जिसका पंजाबी रूप सुश्री तनदीप तमन्ना के पंजाबी ब्लॉग आरसी के 2 सितम्बर 2011 के अंक में प्रकाशित हुआ है।

आपकी छोटी-सी प्रतिक्रिया भी हमारा मनोबल बढ़ाती है, इसलिए अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवश्य अवगत कराते रहें…

सुभाष नीरव


पंजाबी कविता

बेटियों के चाँद-सूरज

डा गुरमिंदर सिद्धू

(हिंदी रूपान्तर : सुभाष नीरव)

बेटियों के लिए

पिता होता है सूरज

ऊबड़-खाबड़ राहों में रौशनी बिखेरता

थके पैरों के सफ़र को ऊर्जा देता

कड़कड़ाते जाड़े में

गुनगुनी धूप सा

और कभी-कभी जेठ-हाड़ की

तीखी दुपहरी जैसा भी

जिसके धुर अन्दर बेटियों के लिए

शीतल छांव का सपना

बो रखा होता है

और एक दिन

किरणों की गठरी

बेटियों के सिर पर रख कर

किसी दूर देश की ओर भेज देता है।

बेटियों के लिए माँ

होती है चाँद

तपते सिर पर

चन्द्र-किरणों का शामियाना तानती

हथेलियों के छालों के लिए

चन्दन का लेप बनती

चीस मारते अटणों के लिए

शहद मीठा चुम्बन

दमघोंटू काली रातों में

दुधिया चाँदनी-सी

और

कभी-कभी

गूंगे साधु की कुटिया जैसी भी

जिसके अन्दर

बेटियों की सात खैरों के वास्ते

एक धूनी तपती रहती है

और एक दिन

माँ बनने का वरदान

बेटियों के माथे पर रख कर

किसी दूर देश की ओर चली जाती है…