मंगलवार, 14 अगस्त 2007

अनूदित साहित्य

सेतु साहित्य में सर्वप्रथम हम "लघुकथा" विधा को ले रहे हैं। इस बार प्रस्तुत है- एक पंजाबी लघुकथा का हिन्दी अनु्वाद-

छुटकारा

लेखक- जसवीर ढंड
हिन्दी रूपान्तर : सुभाष नीरव

माँ बियासी वर्ष की हो गयी है।
कई बार मौत के मुँह से बची है। अब हालत खस्ता ही है।
दिल्लीवाले मामा को गुजरे कई साल हो गये हैं। मामी विद्यावती मामा की पेंशन से गुजारा कर रही है। दो बेटे हैं, पर दोनों की आपस में अनबन रहती है। मामा जीते-जी आधा-आधा मकान दोनों के नाम लिखवा गया था। छोटा जो कस्टम-अफ़सर है, तभी अपने हिस्से का मकान किराये पर उठाकर अलग रहने लगा था- पटेल नगर में।
पिछले साल मामी गुसलखाने में फिसलकर गिर पड़ी थी और कूल्हा टूट जाने के कारण चारपाई से बंध गयी थी। कस्टम अफ़सर बेटे ने तो यह कहकर मामी को रखने से इनकार कर दिया था कि उसके बच्चे छोटे हैं, इन्फेक्शन का डर है। बड़े ने मामी को मिलनेवाली पेंशन में से हज़ार रुपये महीना पर एक माई रख दी थी। वही दिन-रात मामी को सम्भालती। बेटे-बहू को तो फुरसत ही न मिलती, अपने काम-धंधों से।
मैं कल अन्धेरा होने पर बाज़ार से घर लौटा तो मेरे बेटे ने कहा- "डैडी ! दिल्ली से फोन आया था, आपकी मामी जी का स्वर्गवास हो गया।"

"दादी को तो नहीं बताया?" मैंने बेटे से पूछा।
मुझे डर था कि माँ यह सदमा सहन नहीं कर पायेगी। औरतें चाहे कितनी ही बूढ़ी क्यों न हो जायें, मायकेवालों - भाई-भाभियों का मोह कुछ अधिक ही किया करती हैं, यूँ ही सुनकर माँ विलाप करेगी।
"दादी को तो बता दिया।" बेटे ने जैसे सरसरी तौर पर कहा।

"फिर? दादी रोई- कुरलाई नहीं?"

"नहीं, वो तो बोली- चलो, छूट गयी बेचारी दोजख से।"
मेरे सिर पर से जैसे बोझ-सा उतर गया।
माँ के कमरे में गया तो वह अन्धेरे में ही पड़ी हुई थी। लाइट जलाई तो देखा, वह मुँह-सिर लपेटे धीरे-धीरे बेआवाज़ सुबक रही थी।
सिरहाने का एक हिस्सा गीला था।

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3 टिप्‍पणियां:

सुभाष नीरव सम्पादक- सेतु साहित्य ने कहा…

उत्तम प्रयास है ।इससे भारतीय भाषएँ और नज़दीक आएँगी ।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

अच्छी रचना है। आशा है आगे भी और अच्छी रचनाएं पढने को मिलती रहेंगी। बधाई।

Devi Nangrani ने कहा…

लेखक- जसवीर ढंड
छुटकारा पढकर दिल को एक मर्म छू गया जो कभी न कभी कहीं न कहीं दिल के ज़ख्म को फिर हरा भरा कर देता है. खास करके जब माँ शब्द दिल की गहराइयों को छू जाता है.
मामी विद्यावती मामा की पेंशन से गुजारा कर रही है। दो बेटे हैं, पर दोनों की आपस में अनबन रहती है।
जिंदगी की दिशाओं का तकरार है बस, यही जिंदगी है.
शुभकामनाएं
देवी नागरानी