शनिवार, 15 दिसंबर 2007

अनूदित साहित्य

दो संथाली कविताएं/निर्मला पुतुल
हिंदी अनुवाद : स्वयं कवयित्री द्वारा


क्या तुम जानते हो

क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न
एक स्त्री का एकान्त ?

घर, प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन
के बारे में बता सकते हो तुम ?

बता सकते हो
सदियों से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को
उसके घर का पता ?

क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में
किस तरह एक ही समय में
स्वयं को स्थापित और निर्वासित
करती है एक स्त्री ?

सपनों में भागती
एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तों के कुरुक्षेत्र में
अपने-आपसे लड़ते ?

तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गांठें खोल कर
कभी पढ़ा है
तुमने उसके भीतर का
खेलता इतिहास ?
पढ़ा है कभी
उसकी चुप्पी की दहलीज़ पर बैठ
शब्दों की प्रतीक्षा के उसके चेहरे को ?

उसके अन्दर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ों को अपने भीतर ?

क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण ?

बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा ?

अगर नहीं
तो फिर क्या जानते हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में...?

बिटिया मुर्मू के लिए कविता

वे दबे पांव आते हैं तुम्हारी संस्कृति में
वे तुम्हारे नृत्य की बड़ाई करते हैं
वे तुम्हारी आँखों की प्रशंसा में
कसीदे पढ़ते हैं

वे कौन है...?

सौदागर हैं वे... समझो...
पहचानो उन्हें बिटिया मुर्मू... पहचानो !
पहाड़ों पर आग वे ही लगाते हैं
उन्हीं की दूकानों पर तुम्हारे बच्चों का
बचपन चीत्कारता है
उन्हीं की गाड़ियों पर
तुम्हारी लड़कियाँ सब्ज़बाग़ देखने
कलकत्ता और नेपाल के बाजारों में उतरती हैं
नगाड़े की आवाज़ें
कितनी असमर्थ बना दी गई हैं
जानो उसे...।

(
अनामिका द्वारा संपादित और इतिहास बोध प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित पुस्तक "कहती हैं औरतें" से साभार)

10 टिप्‍पणियां:

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

भाषा कोई भी हो, स्त्री की पीड़ा एक ही है, सनातन है।

Devi Nangrani ने कहा…

Bahut Khoob

सौदागर हैं वे... समझो...
पहचानो उन्हें बिटिया मुर्मू... पहचानो !

Kya aurat teri kahani hai
ashkon ki bahti rawaani hai.

Devi

sushil ने कहा…

आज 'साहित्यसेतु' से गुजरा ।अभी पूरा पढना बाकी है । इसमें दो राय नहीं कि अनुदित साहित्य की यह एक सर्वतोमुखी, उत्कृष्ट अंतरजाल पत्रिका है लेकिन आगे में ही संथाली कवयित्री निर्मला पुतुल की स्वयं की अनुदित कविता देखकर एकदम से चौक गया । यह दीगर बात है कि संताली कवयित्री निर्मला पुतुल की ये दोनों कविताऒं के अनुवादक स्वयं पुतुल नहीं,अशोक सिंह हैं और अनुदित संग्रह 'नगाडे़ की तरह बजते शब्द'और अपने घर की तलाश में'से मूलत:उद्धत है,यह वरिष्ठ कवयित्री अनामिका भी जरुर जानती हैं,फ़िर भी यह भूल क्यों ? क्यों अनुवादक के साथ साजिश की जा रही है ? पुतुल, अशोक और मै तीनों दुमका के हैं। इसी अनुवाद के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिये मैने 'भारतीय लेखक'सं-हरिपाल त्यागी ,नोयडा अंक-अप्रिल-जुन07 में एक लेख दिया-"मूल रचना बनाम अनुवाद" । कृप्या इसे पढें अनामिका जी। संप्रति हिंन्दी साहित्य में अनुवादक के साथ हो रही वचंना को गंभीरता से महसूस करने की जरुरत है, वरना वह दिन दूर नहीं जब हिंदी भाषा-साहित्य के विशाल हृदय-प्रदेश में जहां अनेकानेक देशी-विदेशी भाषा-साहित्यों के फूल अनुदित होकर विकसित होते हैं,मुरझाने लगेंगे । मै उपर्युक्त दोनो कविता ही नहीं,बल्कि पुतुल की पूरी काव्य रचना प्रक्रिया से भी वाकिफ़ हूं और एक संताली कृति के हिन्दी अनुवाद( नगाडे़ की तरह बजते शब्द ,अनुवादक-अशोक सिंह) को हिंदी साहित्य के कई सम्मानों के लिये अनुवादक की उपेक्षा कर मात्र इतरभाषी रचनाकार को चयनित करने के मसले पर प्रख्यात आलोचक डा.परमानंद श्रीवास्तव जी के साथ एक सार्थक संवाद, जो 'चाणक्य विचार' लखनऊ के अक्तुबर में छपा है,कर चुका हूं ।
--सुशील कुमार
हंसनिवास/कालीमंडा/पुराना दुमका-814101

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

Priya Subhash,

Setu Sahitya ka naya ank padha. Putul aur Saifi ki kavitayen prabhavit karti hain.

Chandel

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

Dono kaviyon ki kavitayen prabhavkari hain.

Chandel

Ila ने कहा…

सेतु साहित्य में निर्मला पुतुल की ये दोनों कविताएँ पुन: पढ़्कर अच्छा लगा। ये कविताएँ ऐसी हैं कि इन्हें बार बार पढ़ा जाना चाहिए। लेकिन अनुवादक का नाम जरूर होना चाहिए।
इला

sushil ने कहा…

आपने सही कहा इला जी ,मैं निर्मला पुतुल के काव्यवस्तु के मेरिट में नहीं जा रहा हूं,लेकिन हिंदी साहित्य को अनुवादक की हित-चिंता से भी सरोकार होना चाहिए -सुशील कुमार

सुभाष नीरव ने कहा…

मैं भाई सुशील जी की बात से सहमत हूँ,परन्तु मैंने जिस पुस्तक से निर्मला पुतुल की कविताएं साभार ली हैं, उसमें स्पष्ट लिखा है कि कविताओं का हिंदी अनुवाद स्वंय कवयित्री ने किया है। निर्मला पुतुल की कविताएं मुझे बहुत अच्छी लगीं थीं और जैसा कि "सेतु साहित्य" में अन्य भाषाओं की उत्कृष्ट रचनाओं का अनुवाद मैं देते रहना चाहता हूँ, मैंने "कह्ती हैं औरतें" पुस्तक (जिसमें से ये कविताएं ली गईं हैं) की संपादिका अनामिका जी से फोन पर सम्पर्क किया। उनसे मैंने पहले तो कविताओं को "सेतु साहित्य" में देने के लिए अनुमति मांगी जो उन्होंने मुझे सहर्ष दी और दूसरी बात मैंने इनके अनुवादक को लेकर की। उनसे बात करने के बाद ही मैंने कविताएं प्रकाशित कीं और अनुवादक के तौर पर कवयित्री का ही नाम दिया। इनका अनुवाद अशोक सिंह ने किया है, इसकी प्रामाणिक जानकारी मुझे नहीं थी। मैं स्वय अनुवाद से जुड़ा हूँ लेकिन यदि कोई लेखक या कवि अनुवादक का नाम न देना चाहे तो क्या किया जाए। पंजाबी में अजीत कौर, करतार सिंह दुग़्गल तथा अन्य कई लेखक अनुवादक से अपनी रचनाओं/कृतियों का अनुवाद तो करवा लेते हैं परन्तु अनुवादक का नाम देना पसन्द नहीं करते। "सेतु साहित्य' में अन्य भाषाओं की उत्कृष्ट रचनाओं को हिंदी अनुवाद के माध्यम से विश्वभर के हिंदी पाठकों तक पहुँचाना मेरा मंतव्य है, न कि कोई विवाद उठाना। आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से अपनी बात रखी, इसके लिए धन्यवाद। सार्थक टिप्पणियों का "सेतु साहित्य" में सदैव स्वागत है।

नीरज गोस्वामी ने कहा…

निर्मला जी की दोनों कवितायें इतनी मार्मिक हैं की प्रशंशा के लिए शब्द नहीं मिल रहे. मैंने उनका लिखा पहले क्यों नहीं पढ़ा इस बात का ज़रूर अफ़सोस हुआ. आप के प्रति कृतज्ञ हूँ जिसके मध्यम से मुझे इतनी शशक्त रचनाएँ पढने को मिली.
नीरज

raju ने कहा…

बेहद मर्मस्पर्शी कविता.....शुक्रिया.