मंगलवार, 19 फ़रवरी 2008

अनूदित साहित्य

तीन ओड़िया कविताएं
ओड़िया से हिंदी अनुवाद : महेन्द्र शर्मा


काली लड़की
दुर्गाप्रसाद पण्डा


काली लड़की
अकेली कालेज जाए
गोरी लड़कियों की विद्रूप हंसी पार कर
कोई भी नहीं रखे हिसाब
उसके आने-जाने का।

काली लड़की आये तो क्या, जाए तो क्या
वह चले तो आये नहीं, चाय-कप में तूफान
चमके नहीं बिजली
काली लड़की हँसे तो
उठें नहीं किसी के मन में लहरें।

किसी गरम आलोचना में नहीं होता
काली लड़की का नाम
सबके अपमान को सहज
हज़म कर दे काली लड़की।

दु:ख को साथ लिए घूमे
दीवारों से बातचीत करे
कोई भूल से भी पड़े नहीं
काली लड़की के प्रेम में।

सपने देखने से खूब डरे काली लड़की
और सुबह दर्पण से
उसको लगे सबसे अधिक भय।
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दुर्गाप्रसाद पण्डा- ओड़िया के नव दृष्टि-संपन्न कवि। दो काव्य-संकलन प्रकाशित। हिंदी-अंग्रेजी में कुछ कविताओं का अनुवाद प्रकाशित। संपर्क : जगन्नाथ कालोनी, बूढ़ा राजा, संबलपुर(ओड़िसा)।

प्रस्तुति
सुचेता मिश्र

एक खुशखबरी लाने गया इन्सान
एक दिन ज़रूर लौटेगा !

उससे तुमने कहा है-
राजा-रानी का विवाद
चाँद पर पहुँचे आदमी की असुविधाएं
मानचित्र को रौंदती
शीत युद्ध की समस्या

उसने तुमसे सिर्फ
एक सवाल पूछा है-
खेत से जाकर शस्य कहाँ रहते हैं?

तुमने उसे किस ठिकाने भेजा है
अधगढ़े भाग्य
एक संकल्प का व्यंग्य लिए
वह गया तो गया है।

अगर वह थक गया है
तुम खुश मत होओ
अगर मर गया है
तो भी नहीं
पुनर्जन्म की तरह लौटेगा वह।

तुम छिपा रखो
सारे अस्त्र-शस्त्र
वह अपनी छाती भीतर परमाणु को
युद्ध में लगाना सीख चुका होगा।

कविता को बदलो मत
सुचेता मिश्र

कुल्हाड़ी-सी
तमाम अमानवीय चमक के खिलाफ
खड़ी होना चाहे कविता।

तुम अपार करुणा की बात करते हो
कविता अपने भीतर
जलाये रखना चाहे आग
अकाल पीड़तों का शव-संस्कार कर
तुम लौट आ सकते हो
एक पवित्र संग्राम का
दृष्टांत तलाशने
मृत लोगों के घर तक भी
पहुँचना चाहे कविता।

अत्याचार तब्दील होता समाचार में
कभी भी छ्पता नहीं
मनुष्य का अपमान
कविता को बदलो मत
तुम्हारे अपमान को
एक शाश्वत नाम देने
लड़ना चाहे कविता।

जब रिलीफ कापी में लिखा जाए
मृत आदमी का नाम
और उसके भाग्य का चावल जाए
भव्य रसोई में
जब भाषण में सुनाई दे
कविता की नकल
फसल और पंक्तियों को बचाये रखने
जिस किसी विस्फोटक के सामने
खड़ी हो सकती है कविता।

कविता को बदलो मत
सारे दिग्विजय
सारे राज्याभिषेक के बाद भी
इतिहास में सिर्फ रह जाए
जो थोड़ी-सी कम जगह
वहाँ रहना चाहे कविता
कविता को बदलो मत।
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सुचेता मिश्र- ओड़िया की प्रखर कवयित्री। कविता की आठ-नौ पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी-अंग्रेजी में बहुत-सी कविताएं अनूदित-प्रकाशित। अनेक पुरस्कारों से सम्मानित। संपर्क : ओल्डलीड बैंक लेन, पुलिस लाइन, पुरी-1, ओड़िसा।


अनुवादक संपर्क :
महेन्द्र शर्मा, नं-6/503, आइ आर सी विलेज
भुवनेश्वर-15(ओड़िसा)

(उपर्युक्त तीनों कविताएं “वर्तमान साहित्य” के फरवरी 2008 अंक से साभार)

4 टिप्‍पणियां:

झकाझक टाइम्स ने कहा…

लड़्की हो काली
समाज में टिक ही जाती है
काली हो कविता
तो किसको भाती है
जबकि कविता ही
सब कुछ उपजाती है
इतना भी नहीं डरती
लड़की काली
जितना कवि को लगा है
डरते हैं बहुत सारे
देखकर लड़की काली
और नहीं दे पाते हैं
गा ली, न गा पाते हैं
मवाली.

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

भाई सुभाष,

सेतु साहित्य में उड़िया कविताएं पढ़ीं . तुम इतना काम कैसे कर लेते हो ? अच्छी रचनाओं का चयन वह भी अन्य भाषाओं से -- बधाई .

चन्देल

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

अच्छी रचनाओं का चयन,बधाई!

कमल शर्मा ने कहा…

बेहद उम्‍दा कविताएं चाहे उड़ीया हो या जापानी।