मंगलवार, 29 मार्च 2011

अनूदित साहित्य


पंजाबी कविता

विशाल की दो कविताएँ
हिंदी अनुवाद : सुभाष नीरव


पुरखे
समझ - नासमझ की उम्र थी मेरी उस वक़्त
दादा, पिता से कहते -
अब वो समय नहीं रहे
हमारे समय बात और होती थी
मेरा क्या पता कब आँखें मूंद जाऊं
अपना आगा-पीछा संभाल
सयाना बन।

पिता ने भी ऐसी ही हिदायतें
मेरे आगे रखीं
हमारे समय अच्छे होते थे
अब वो बातें नहीं रहीं
समय बहुत नाज़ुक है
ध्यान से क़दम उठाना
लोग कहते कु और हैं
करते कुछ और हैं
बुरे-भले की पहचान करना।

पिता के माथे की त्यौरियां
हो गईं मेरे में ज़रब
और मुझे लगा
कि समय वाकई बड़ा नाज़ुक है
समझ कर चलने की ज़रूरत है

अपने जवान हो रहे बेटे को
देखकर मैंने सोचा
मेरा भी फ़र्ज़ बनता है
कि इसको कुछ समझाऊँ -
समय बदलता जा रहा है
आने वाला कल पता नहीं कैसा हो
अपने पैरों पर खड़ा हो ...

बेटे ने बात काटी -
आप बात कल की करते हो
मैं तो आज को लेकर भी नहीं सोचता
सोचता हूँ तो
उन ख़ूबसूरत पलों के बारे में
जो मैं अब जी रहा हूँ।

इससे पहले कि मैं उसकी तरफ देखता
वह आकाश की ओर देख रहा था।

वार्तालाप की गूँज

मैं आजक अक्सर
तेरे बारे मैं सोचने लग पड़ा हूँ
जैसे कोई पानियों में
पानी होकर सोचता है।

तुझे गुनगुनाने लग पड़ा हूँ इस तरह
जैसे प्रात:काल के 'शबद' का आलाप
तेरी तलाश का सफ़र
किसी अनहद राग का मार्ग
तेरी याद तेरा मिलन
सरगम के सारे सुर
अधूरे सिलसिले
कुछ संभ, कुछ असंभव
अतृप्त मन की कथा।

अथाह पानियों में घिरा हूँ तब भी
मेरे लिबास की तपिश वैसी ही
तू बर्फ की तरह मेरे पास रह
मेरी रेतीली प्रभात
मेरे भावों के मृगों का रंग तो बदले
कि बना रहे जीने का सबब।

मैं लम्हा -लम्हा तेरा
मेरे अन्दर बैठे पहाड़ के लिए
तू बारिश बन
मैं भीग भीग जाऊं
तेरे अन्दर बह रही नदी के संग
हो जाऊं मैं भी नदी
मेरी नज़र की सुरमई शाम पर
इस अजीब मरहले को
स्मृतियों के भार से मुक्त कर दे
तुझे संबोधित होते हुए भी चुप हूँ
यह सबकुछ मैं तुझसे कह रहा हूँ...
००
(यह दोनों कवितायेँ विशाल के सद्य प्रकाशित पंजाबी कविता संग्रह 'त्रेह'(प्यास) से ली गईं हैं)

पंजाबी कविता में पाश, पात्तर के बाद जिन कवियों ने अपनी कविता की बदौलत एक खास पहचान बनाई, उनमें विशाल एक प्रमुख नाम है अब तक चार पंजाबी में चार कविता पुस्तकें - 'तितली ते काली हवा (१९९२,२००५)', 'कैनवस कोल पई बंसरी (१९९९)', 'मैं अजे होणा है(२००३)' और 'त्रेह (२०११)' तथा दो गद्य पुस्तकें - 'थारी याद चौखी आवे (२००५,२००६)' और 'इटली विच मौल्दा पंजाब (२००२)' प्रकाशित
संपर्क : Milono 116 B, Breesica- 25100, Italy
फ़ोन :
0039-3661818889

10 टिप्‍पणियां:

सुभाष नीरव ने कहा…

विशाल की कविताओं पर डा. शरद सिंह ने अपनी टिप्पणी प्रेषित की है जो नीचे दी जा रही है-


विशाल जी की दोनों कविताएँ पढ़ कर
आनन्द आ गया...

दोनों कविताएं एक अलग ही भाव-संसार में ले जाती हैं...
डा. शरद सिंह

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

सुभास जी त्रेह मुझे भी मिल चुकी है .....
मैं भी कुछ कवितायेँ अनुवाद करना चाहती थी विशाल जी की ....
मुझे विशाल जी को डॉ विनीता द्वारा सम्पादित किसी पुस्तक में पढने का मौका मिला
और इनकी कविताओं ने मुझे बहुत प्रभावित किया ..
कमाल का लिखते हैं ....
सीधे रूह में उतर जाती है इनकी रचनायें ....
जैसे ये पंक्तियाँ .....

जैसे कोई पानियों में
पानी होकर सोचता है।

इनका E-mail संभव हो तो दें .....!!

सुधाकल्प ने कहा…

वार्तालाप की गूंज बेहद स्पष्ट्वादी कविता है ।परम्पराओं में जकड़े लोगों को इस बात की अनुभूति होनी चाहिए कि नई पीढ़ी भी समझदार है |हाथ से हाथ मिलाकर उनके साथ चला जाय तो अच्छा है। कवि को बधाई है |
सुधा भार्गव

बेनामी ने कहा…

भाई सुभाष,


मैंने ब्लॉग पर टिप्पणी छोड़ने का प्रयास किया, लेकिन गयी नहीं. नीचे दे रहा हूं. इसे बेनामी में ही लगा देना.


"विशाल की कविताएं मन को गहराई तक स्पर्श करती हैं. पहली कविता ’पुरखे’ सामयिक संदर्भ की सूक्ष्म अभिव्यक्ति है. लेकिन अंतिम पंक्ति में यदि ’अम्बर’ के स्थान पर ’आकाश’ होता तो शायद अधिक सटीक रहा होता. वैसे मैं कविता के मामले में कोरा कागज हूं. तुम कवि-कथाकार दोनों ही हो इसलिए अनुवाद में सही ही शब्द पकड़ा होगा.


रूपसिंह चन्देल
९८१०८३०९५७

PRAN SHARMA ने कहा…

APNEE KAVITAAON KEE PANKTI - PANKTI
MEIN VISHAL JI VISHAALTA KA BKHOOBEE PARCHAY DETE HAIN . UMDA
KAVITAAON KE LIYE UNHEN BADHAAEE
AUR SHUBH KAMNA . BADHAAEE AUR
SHUBH KAMNAA VARISHTH SAHITYAKAAR
SUBHASH NEERAV JI KO BHEE JO
PANJAABI KE STARIY SAHITYA KO
ANUWAAD KARNE MEIN JUTE HAIN AUR
UPLABDH KARWAA RAHEN HAIN .

बेनामी ने कहा…

सुभाष जी
दूसरी कविता [शब्दों की गूँज वाली ] बेहद पसंद आई ,मूल और अनुवाद दोनों दृष्टियों से !
बधाई स्वीकार करें !
सादर
रेखा
rekha.maitra@gmail.com

सुनील गज्जाणी ने कहा…

sunder kavitao keliye badhai sadhuwad .

ashok andrey ने कहा…

vishal jee ki dono kavitaon ne achchha prabhav chhoda hai badhai

सुशील कुमार ने कहा…

भाई सुभाष नीरव जी,
मार्च की व्यस्तता के कारण आज मैंने पंजाबी कवि विशाल जी ये अनुदित कविताएँ पढ़ी। पहली कविता" पुरखे" दो पीढ़ियों के बीच जेनेरेशन गैप को रेखांकित करती है। समय के साथ सोच में बदलाव और सोचने के तरीके कितने बदल जाते हैं! दूसरी कविता अनूठी प्रेम कविता है जो जीने के आत्मविश्वास से लबरेज है। कवि विशाल जी के साथ-साथ जीवंत अनुवाद के लिये आपको भी बधाई। शब्दों का प्रयोग और कविताई का नया ढ़ंग भी कविता को उँचाई प्रदान करता है।

Sandip ने कहा…

विशाल जी की दोनों कविताएं बहुत अच्छी लगी !