गुरुवार, 17 अप्रैल 2008

अनूदित साहित्य




पाँच जापानी कविताएं - ज्यून तकामी

हिंदी अनुवाद : अनिल जनविजय
(इस पोस्ट के सभी चित्र : अवधेश मिश्र)

मैं कमज़ोर हूँ

मैं कमज़ोर हूँ
मैं लड़ नहीं सकता
ख़ुद जीने के लिए मैं दूसरों को
जाल में नहीं फँसा सकता

मैं कमज़ोर हूँ
लेकिन मुझे इतना नीचे गिरने में
आती है शरम
कि कत्ल करूँ दूसरों का
ख़ुद जीने के लिए

मैं कमज़ोर हूँ
लेकिन मुझे इतना नीचे गिरने में
आती है शरम
कि दूसरों के शब्दों को कह सकूँ
अपने शब्दों की तरह

मैं कमज़ोर हूँ
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पैंसिल



बहुत उदास है पैंसिल...

दूर नहीं रही मुझ से कभी जो
मेरी सब कविताओं की माँ है वो
अब घिस गई...

पैंसिल ओ पैंसिल !
मेरे लिए घिस दिया तूने अपना शरीर
सारा जीवन चाकू की झेली तूने पीर
मरने से पहले भी हुई न अधीर
आत्मत्यागी है तू जैसे कोई फकीर

ओ पैंसिल मेरी !
मन में है मेरे विचार कुछ ऎसा
कि बन जाऊँ मैं बिल्कुल तुझ जैसा ।
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जैसे अंगूर में बीज़ होता है


अंगूर के दाने में जैसे
छिपा होता है बीज़
मेरे मन के भीतर भी वैसे
छिपी है खीज ।


खट्टे अंगूर से बनती है
तेज़ मादक शराब
ओ खीज मेरे दिल की
बन जा तू भी ख़ुशी की आब ।
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ब्लैक-बोर्ड

अस्पताल के हमारे इस कमरे में
परदे सफ़ेद हैं
शाम का डूबता हुआ सूरज
उनमें रंग भरता है

यह कमरा बिल्कुल वैसा ही है
जैसे हमारे स्कूल का कमरा था
मुझे याद आते हैं अपने वे अध्यापक
अंग्रेज़ी पढ़ाते थे जो हमें
ब्लैक-बोर्ड को ढंग से साफ़ करके
अपनी बगल में दबाकर क़िताब
हमसे विदा लेते थे वे--
"फिर मिलेंगे, दोस्तो !"

जब कक्षा से बाहर निकलते थे वे
शाम के डूबते हुए सूरज की रोशनी
उनके कंधों पर लहराती थी

मैं भी जाना चाहता हूँ जीवन से
सब कुछ पूरी तरह साफ़ कर
"फिर मिलेंगे, दोस्तो !" कहते हुए
वैसे ही जैसे मेरे अध्यापक
पाठ ख़त्म करके कक्षा से निकलते थे।


जैसे एन्कू ने बुद्ध की मूर्ति बनाई



मैं वैसे ही कविता
लिखना चाहता हूँ
जैसे एन्कू ने बुद्ध की मूर्ति बनाई

मैं वैसे ही रिरियाना
चाहता हूँ कविता में
जैसे कोई चोट खाया कुत्ता किंकियाता है

मैं चाहता हूँ कि वैसी ही
चमकदार हों मेरी कविताएँ
जैसे पीले-पीले चमकते हैं गेंदे के फूल

मैं वैसी ही सरलता के साथ
लिखना चाहता हूँ कविताएँ
जैसे उड़ते-उड़ते चिड़िया गिराती है बीट

और कभी-कभी मैं इतनी ज़ोर से
कविताएँ पढ़ना चाहता हूँ
जैसे गूँजती है सीटी जलयान की रवाना होने से पहले।
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अनुवादक संपर्क :
अनिल जनविजय
मास्को विश्वविद्यालय, मास्को
ई मेल : aniljanvijay@gmail.com

5 टिप्‍पणियां:

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

प्रिय सुभाष,

सेतु साहित्य का नया अंक . ज्यून तकामी की कविताओं का अनिल जनविजय द्वारा किया अनुवाद पढा़. अद्भुत कविताएं और उम्दा अनुवाद. तुम्हे और अनिल को बधाई.

चन्देल

सुशील कुमार ने कहा…

अनुवाद सृजन का पुनस्सृजन है,इसलिये साहित्य की एक जटिल ,किंतु जरुरी विधा है ,जिसमें दक्ष होना एक बड़ी बात है। अनुवादक को विधा-विशेष की जानकारी रखने के अतिरिक्त उस भाषा का भी निपुण जानकार होना पड़ता है जिससे यह अनुदित किया जा रहा है। अनिल जनविजय द्वारा किये गये इस अनुवाद से अनुवाद साहित्य के सुखद भविष्य की आश्व्श्ति होती है। सफल अनुवाद के लिये अनिल जी को बधाई।- सुशील कुमार( sk.dumka@gmail.com)

योगेंद्र कृष्णा ने कहा…

अनिल जी का जापानी कविताओं का अनुवाद बहुत अच्छा लगा । मेरी बधाई लें और अनिल जी को भी दें ।

बेनामी ने कहा…

अनिल जनविजय जी,

नमस्कार !

आपके अनुवाद कार्य से मैं "सेतु-साहित्य" के माध्यम और सुभाष जी के सौजन्य से परिचित होता रहा हूं। आपका योगदान प्रशंसनीय है।

मैं अमेरिका में रहता हूं और हिंदी लेखन से भी जुडा हूं। कुछ सम्बंधित लिंक आपको भेज रहा हूं -

http://www.penguinbooksindia.com/hindi_004.aspx
www.kshitijus.com
http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/S/ShailjaSaksena/chudiyanvala_Sameeksha.htm

शेष आपसे सम्पर्क बना रहेगा, इसी आशा के साथ,

सादर,

अमरेन्द्र

Amit K. Sagar ने कहा…

यहाँ आना बड़े मजेदार रहा. दिलचस्प. सुंदर. जारी रहें.
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यहाँ भी पधारे;
उल्टा तीर