शनिवार, 30 अगस्त 2008

अनूदित साहित्य


पंजाबी कविता

पिछले दिनों पंजाबी की त्रैमासिक पत्रिका “प्रवचन” के नए अंक (जुलाई-सितम्बर 2008) में इमरोज़ जी की कविताएं पढ़ने को मिलीं। कविताएं पढ़कर हैरान था क्योंकि मैंने इमरोज़ जी को रंगों और ब्रश के कलाकार के रूप में ही अभी तक देखा-जाना था। उनकी पेंटिंग्स और स्कैच्स मुझे अपनी ओर खींचते रहे हैं। पर एक कवि के रूप उन्हें पहली बार देख-पढ़ रहा था। मैंने तुरन्त इमरोज़ जी से सम्पर्क किया। उन्होंने सहर्ष अपनी कविताओं के हिन्दी अनुवाद को “सेतु साहित्य” में प्रकाशन की अनुमति देते हुए कहा कि “अगर मेरी ये नज्में पाठकों को अच्छी लगती हैं तो अब ये उन्हीं की ही हैं।” अपने बारे में बेहद संक्षिप्त जानकारी देते हुए कहा कि मैं रंगों और ब्रश का कलाकार रहा हूं, पर आजकल कविताएं भी लिखने लगा हूँ। उन्होंने बताया कि वे लाहौर आर्ट स्कूल में तीन वर्ष रहे, पर जो कुछ भी सीखा है, वह खुद काम करके सीखा है। उनका मानना है कि पेटिंग और कविता सिखाई नहीं जा सकती। बस, जिनके अन्दर इनका बीज होता है, वह स्वयं फूट पड़ता है और फलता-फूलता रहता है।

मेरे लिए यह दिलचस्प संयोग की बात रही कि इधर मैंने इमरोज़ जी की पंजाबी कविताएं पढ़ीं और उनसे बात करके उनके हिन्दी अनुवाद को “सेतु साहित्य” में प्रकाशित करने का मन बनाया, उधर उसी दिन ‘अमृता-इमरोज़’ पर शायदा जी की बेहद खूबसूरत तीन पोस्टें उनके ब्लाग “उनींदरा” में पढ़ने को मिलीं। इस पोस्ट में दिए इमरोज़ जी के पहले दो चित्र “उनींदरा” से ही साभार लिए गए हैं।


इमरोज़ की कविताएं
पंजाबी से अनुवाद : सुभाष नीरव

बीज

एक ज़माने से
तेरी ज़िन्दगी के दरख़्त
कविता को
तेरे साथ रहकर
देखा है
फूलते, फलते और फैलते…
और जब
तेरी ज़िन्दगी का दरख़्त
बीज बनना शुरू हो गया
मेरे अन्दर जैसे
कविता की पत्तियाँ
फूटने लग पड़ीं
और जिस दिन
तेरी ज़िन्दगी का दरख़्त बीज बन गया
उस रात इक कविता ने
मुझे बुलाकर अपने पास बिठाया
और अपना नाम बताया

अमृता-
जो दरख़्त से बीज बन गई

मैं काग़ज़ लेकर आया
वह कागज़ पर अक्षर-अक्षर हो गई

अब कविता अक्सर आने लग पड़ी है
तेरी शक्ल में तेरी ही तरह मुझे देखती
और कुछ समय मेरे संग हमकलाम होकर
मेरे अन्दर ही कहीं गुम हो जाती है…
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प्यास
आदमी ज़िन्दगी जीने को
शिद्दत से बड़ा प्यासा था
इस प्यास के संग चलता
ज़िन्दगी का पानी खोजता-तलाशता
वह एक चश्मे तक पहुँच गया
प्यास इतनी थी
कि वह न देख सका, न पहचान सका
कि यह ज़िन्दगी का चश्मा नहीं
वह तो प्यासे पानी का चश्मा था
प्यास बुझाने को जब वह
पानी के करीब गया
प्यासे पानी ने आदमी को पी लिया…
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सोहणी
तस्वीरों की दुकान के बाहर
सोहणी की तस्वीर देखी
मैं इस सोहणी को घर ले आया
इस सोहणी को देखते-देखते
मुझे कल की
वह सोहणी दिखाई देने लग पड़ी
जिसने पंजाब का एक दरिया
कच्चे घड़े से पार किया था
कई बार…
और आज मुझे
एक और सोहणी दिखाई दे रही है
जिसने आधी सदी से
अपनी कलम से
सारा पंजाब पार किया है-
लगातार…
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चार छोटी कविताएं

(1)
हाथ में पकड़ा फूल
चुपचाप कह सकता है
कि मैं अमन के लिए हूँ
पर हाथ में पकड़ी तलवार
बोलकर भी नहीं कह सकती
कि मैं अमन के लिए हूँ…
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(2)
आसमान पर भले ही
आसमान जितना लिखा हो
कि ज़िन्दगी दु:ख है
तो भी
धरती पर आदमी
अपने बराबर तो लिख ही सकता है
कि ज़िन्दगी सुख भी है…
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(3)
मैं रंगों के संग खेलता
रंग मेरे संग खेलते
रंगों के संग खेलता-खेलता
मैं इक रंग हो गया
कुछ बनने, कुछ न बनने से
बेफिक्र, बेपरवाह…
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(4)
बिखरने के लिए लोग ही लोग
पर एक होने के लिए
एक भी मुश्किल…
दरख़्त पंछियों को जन्म नहीं देते
पर पंछियों को घर देते हैं…
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संपर्क : के-25, हौजख़ास,
नई दिल्ली-110016



फोन : 011-26519278

10 टिप्‍पणियां:

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

प्रिय सुभाष,

अमृता प्रीतम पर इमरोज के संस्मरण पढ़े थे और उनकी रचनात्मकता से परिचित हुआ था. तुम्हारे द्वारा उनकी कविताओं का अनुवाद पढ़ा . बहुत अच्छी कविताएं हैं. सेतु साहित्य के माध्यम से तुम उल्लेखनीय काम कर रहे हो.

चन्देल

नीरज गोस्वामी ने कहा…

सुभाष जी
किन लफ्जों में आप का शुक्रिया अदा करूँ, इमरोज़ साहेब की इन बेहतरीन रचनाओं को पढ़वाने के लिए...समझिये आप ने ये उपकार ही है हम पर...इमरोज़ साहेब ने किस खूबसूरती से ज़िन्दगी,प्यार, तड़प, तन्हाई,याद को अपनी रचनाओं में उकेरा है...मन बार बार वाह वाह कर रहा है...
नीरज

Devi Nangrani ने कहा…

Subash ji
aapki sahitya ke prati jo bhavnatmak umang hai uska jawab nahin. Anuwaad kar ke prastut karna..daad kabool ho

अमृता-
जो दरख़्त से बीज बन गई

मैं काग़ज़ लेकर आया
वह कागज़ पर अक्षर-अक्षर हो गई

Imroz ji ke indradhanushi rang shabd v rang ke maadhyam se zindagi ko sunderta baksh rahe hain. Unhein meri shubhkamnayein kabook ho
Devi

बेनामी ने कहा…

Subhash ji,
setu sahitya par Pash ki kavitaon se lekar Imroz ji tak to pad dala. aapke blog ki jitni taareef ki jaye, kam hai.
Ila

बेनामी ने कहा…

मैं रंगों के संग खेलता
रंग मेरे संग खेलते
रंगों के संग खेलता-खेलता
मैं इक रंग हो गया
कुछ बनने, कुछ न बनने से
बेफिक्र, बेपरवा-----bahut khoob
Emroz ki kavitaayen jindagi ke rangon se nikhar si gayi hain--ek gahare prem v rangon ki kashish avm khushboo se saraabor jivan jine waale ensaan ki chhaviyan en kavitaaon me har jagah apani uapastithi darz karaati hain.
ranjana shrivastava
siliguri,(West Bengal)

बेनामी ने कहा…

धन्यवाद । अच्छा कार्य है ।

सृजनगाथा का नया अंक देखें ।
सादर
"संपादक (सृजनगाथा)" srijangatha@gmail.com

vipin-choudhary ने कहा…

shbhash neerav ji, Emroj ke kavetaye prakashit karne ke leye dhanyawad.

अशोक लव: मोहयाल ने कहा…

imroz kee panjaabee kaviton ko parhaa. chitrakaar kee skhsham drishati ne shabdon kaa gahan roop liyaa hai..
kavi aur aapko badhai.
**ashok lav

harkirathaqeer ने कहा…

subhas ji, aapne meri dilee iccha puri kr di. amrita ji se to kabhi rubru nahi ho payi pr aapke madhyam se sayad imroj ji se vartalap ho jaye? mai unhen apna sangklan bhej rahi hun. unki kavitaon me amrita ji ki chap hai.
harkirat kalsi haqeer
guwahati

maheep singh ने कहा…

Subhash Ji
Mubarak
Shukriya
Shubhkamnayen